Sunday, 28 July 2013

जमीं का टुकड़ा



कल फिर एक मौत पर
रोटियां सेकी गयीं
सियासतदानों ने कुछ
यूँ गम गलत किया,
जो लड़ते थे,झगड़ते थे
छोटी- छोटी बात पर  
आज जमीं का ये टुकड़ा तेरा
जमीं का वो टुकड़ा मेरा किया.


रविश 'रवि'
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Thursday, 25 July 2013

क़दमों के निशाँ

तेरे लबों की तपिश लटकी हुई है
टेबल लैम्प पर,
जो ज़ीरो वाट के बल्ब की रोशनी को
ओर तेज़ चमका रही है....

तेरी बाँहों के साये में
छत का घूमता पंखा,
मदमस्त होकर
तेरे बदन की खुश्बू को बिखेर रहा है... 

एक छोटा सा लम्हा
तेरी मुस्कुराहटों का !
चस्पा हुआ है दीवार के कोने में....

ओर तेरी खिलखिलाती हुई हंसी
तैर रही है पुर-जोर घर में,

बालकनी में उगा हुआ गुलाब का फूल 
अब भी महक जाता है
पानी उन की नन्ही-नहीं बूंदों से,
जो अक्सर छिटक जाती थीं तेरे गेसुओं से
जब तुम नहा कर बाल सुखाती थीं

ओर 

क़दमों के वो जाते हुए निशाँ 
आज भी हैं 

घर की दहलीज़ पर, 

जो बाहर जाते हुए तो नज़र आते हैं 

पर

वापस आते हुए नज़र नहीं आते हैं.



रविश 'रवि'
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Wednesday, 10 July 2013

उसके होने का मतलब...

आज आसमां ने मुझसे दगा कर लिया
उनकी आँखों से काजल चुरा भर लिया,
सांसों की महक से हवा यूँ मदमस्त हुई
फिर उसने न रुकने का इरादा कर लिया.

लरजते हुए लबों को जो छुआ बूंदों ने
सागर ने खुद के पानी को मीठा कर लिया,
सरमा कर खुद में सिमट गई ज़मीं भी
अपने कांधों से दुपट्टा जो सरका भर लिया.

बरसा है पानी कुछ यूँ झूम-झूम कर
उठा नज़रें आसमां को जो देख भर लिया,
देख कर रात में उनके काँधें का तिल
चाँद ने अपनी चांदनी से किनारा कर लिया.



रविश 'रवि'
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Friday, 5 July 2013

धूप के निशाँ

अक्सर घर की मुंडेर पर
धूप आकर बैठ जाती है
और
देर तलक बैठी ही रहती है

शायद...किसी का इंतज़ार करती है
कभी बिलकुल ख़ामोश रहती है
और कभी खुद से ही बातें करती है

ज्यों-ज्यों दिन चदता जाता है
त्यों-त्यों उसकी शिथिलता बढती जाती है
मगर आँखों में इंतज़ार की चमक
बरक़रार रहती है

और फिर...
शाम के जवान होते-होते
समेट लेती है खुद को
और चल पड़ती है वापस
उसी ख़ामोशी से
जिस ख़ामोशी से
बैठी थी मुंडेर पर आकर

और छोड़ जाती है
कुछ अनबुझे से,
कुछ अनसुलझे से
निशाँ,
घर की मुंडेर पर ! 


रविश 'रवि'
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Wednesday, 19 June 2013

बागवां....

वो ऊँगली...
जिसे थाम सीखा चलना मैंने,
वो हाथ....
जिसे थाम सीखा संभलना मैंने,
और
वो क़दमों के निशां...
जिन पे चल के जीना सीखा मैंने,

कांधे पे बैठा कर नुमाईश में घुमाना,
घोड़ा बन कर सारी दुनिया की सैर कराना,

मेरे एक रोने की आवाज़ पर,
सारे जहाँ की खुशियाँ क़दमों में डाल देना...
मेरी एक छोटी सी जिद के लिए,
अपनी बड़ी से बड़ी खुशी कुर्बान कर देना... 

थी चाहे बारिश की सीलन या धूप की तपत,
रहा वो हमेशा मेरा शरमाया, बन के एक दरख़्त... 

देता है आज भी हिम्मत वो हाथ कुछ यूँ –
गर हो परेशां तो थाम लेना मुझे,
हो तुम मेरे ही अंश....
और मै बागवां तुम्हारा.....
मै वक्त का मोहताज़ नहीं,
जो लौट के आ न सकूं...

शायद आ न सकता था आसमां वाला,
हर घर में.....
इसीलिए भेज दिया उसने खुद कों ज़मीं पर,
पिता के रूप में...
पिता के रूप में...
पिता के रूप में...


रविश 'रवि'
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Monday, 17 June 2013

फिर वही मौसम

वही तो है मौसम आज भी 
और रुत भी वही छाई है,
गए बरस में हुआ था यूँ ही 
तेरी पलकों तले शाम हुई थी...

है मेरे सीने पर आज भी वो
पानी की नन्ही-नन्ही बूंदें
जो तेरे लबों को छू कर
लजा के शर्मसार हुई थीं....

आज फिर बरसें है बादल 
भीगा है मौसम इस तरह
मानों कल ही तेरे शानों पर 
मेरे ख्वाबों की रात हुई थी.



रविश 'रवि'
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Monday, 3 June 2013

जब भी मिलती है

जब भी मिलती है
अजनबी सी मिलती है,
कभी धूप तो कभी
छाँव सी मिलती है,
होती हैं नज़रे दो-चार,
सरे राह पर मिलती है
पर ऐ ज़िंदगी तू रोज़,
रकीब-ए-यार सी मिलती है.



रविश 'रवि'
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