Thursday, 5 December 2013

उजालों की गिरह

दिन कट गया
उजालों की गिरह
खोलने में,
आज की रात
अंधेरों की जुल्फों को
संवारने का
इरादा है.




रविश 'रवि'
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Tuesday, 26 November 2013

दिल की बात !

बात जो दिल से निकली तो
दूर तलक जायेगी....
फिर ये खास नहीं
आम हो जायेगी,
झूठ कह नहीं पाउँगा और
सुच तुझ से
सुना नहीं जायेगा....मेरे मौला !


रविश 'रवि'
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Monday, 11 November 2013

आँखों के बंद होने से पहले

तन्हाई भरी रातों मे
अक्सर....
आँखों के बंद होने से पहले
कुछ धुंधले से साए
जाग जाते हैं,

कुछ आँखों मे नज़र आते हैं
कुछ आँखों से नज़र आते हैं

फिर .....
कुछ टूटे हुए लम्हे
कुछ छूटे हुए लम्हे
चुभो देते हैं नस्तर
दिल तक.....
तो कभी रूह तक...

आँखों की नमी भी सुख जाती है
उस दर्द की तपिश मे
जो महसूस होती है
यादों के टूटे हुए शीशों के टुकड़ों से

चुपके से धंस जाते हैं शरीर मे
और..
निकल पड़ती हैं लहू की बूंदें
दर्द के रूप मे.....

और हम करवटें दर करवटें  
बदलते रहते हैं
तन्हाई भरी रातों मे
अक्सर.....

आँखों के बंद होने से पहले |




रविश 'रवि'
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Wednesday, 6 November 2013

बिखरना

किस तरह
संभालूं खुद को,
कुछ न कुछ
छूट जाता है,
ऐ ज़िंदगी...
तुझे जीने में,
कभी रात
तो
कभी दिन
बीत जाता है.


रविश 'रवि'
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Monday, 14 October 2013

काली दीवारें

घर की दीवारों को
हैं बहुत उम्मीदें....
इस बरस तो वो चमकेंगी ही !!!

अरसा हो गया
दीवारों को रंगें हुए ...

तेरे नाज़ुक हाथों की
मेहंदी के निशां
आज भी चमकते हैं
काली पड़ी दीवारों पर....




रविश 'रवि'
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Wednesday, 2 October 2013

अजनबियों का शहर

ये अजनबियों का शहर है
देख कर चला करो,
है हर हाथ में खंजर
जरा संभल कर मिला करो.

बाल अक्सर हो जाते हैं
धूप में भी सफ़ेद,
आईने में इनको देख कर
चारागरी न किया करो.

खुद को मालिक समझने की
दिल कर ही देता है खता,
हवा भी अक्सर गिरा देती है 
जमीं के हो,जमीं पे ही चला करो.




रविश 'रवि'
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Wednesday, 25 September 2013

तुझसे नाराज़ नहीं जिंदगी

तुझसे नाराज़ नहीं जिंदगी
तेरे फैसलों से हैरान हूँ
 जाने किस मोड़ पे  गया हूँ
खुद पशेमान हूँ

है हर तरफ उजाला
फिर भी नहीं नज़र आता है कुछ
हैं कांधे तो बहुत
पर किस पे रखूं हाथ ?

हो गया हूँ तन्हा....बहुत
लगने लगा है यूँ
न है कोई मंजिल
 है कारवां

न है कोई पगडंडी और  ही राह
जिसको लूँ पकड़.....

खुद को पा रहा हूँ 'चक्रव्युहमें
क्या अभिमन्यु की तरह मै भी
रह जाऊँगा जिंदगी के चक्रव्युह में !!!
यूँ ही बन जाऊँगा ग्रास चक्रव्युह में......

कोई 'कृष्ण' भी तो नहीं आता है नज़र
जिससे पूछ सकूँ
खुद को बचाने का रास्ता !!!! 
       
न जाने किस मोड़ पे आ गयी है....जिंदगी
न है कोई कारवां.........न कोई मंजिल.....

तुझसे नाराज़ नहीं जिंदगी
तेरे फैसलों से हैरान हूँ
न जाने किस मोड़ पे आ गया हूँ
खुद पशेमान हूँ.




रविश 'रवि'
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