Wednesday, 1 January 2014

ख्वाहिश

तेरे सिवा किसी और की ख्वाहिश करी
ये मेरी खता थी मेरे मौला,
मुझे किसी और की ख्वाहिश अता करी

ये तेरी खता थी मेरे मौला.



रविश 'रवि'
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Monday, 23 December 2013

हया

कुछ इस तरह आ मेरे आगोश में
कि मेरे वजूद को तेरी खबर न हो,
आँखों से पढ़ लूँ तेरी हया को मै
कि तेरे हिजाब को भी खबर न हो.



रविश 'रवि'
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Monday, 16 December 2013

फितरतें

हम इंसान भी फितरतें अजीब रखते हैं
देकर ज़ख्म,अपने दर्दों का हिसाब रखते हैं,

कहाँ ? कब ? क्यों? और क्या किया?
ये भूल कर, दूसरों की किताब रखते हैं,

दिखा कर आईना अपनी हसरतों का
न जाने गुनाह कितनी बार करते हैं,

तोड़ते हैं उसूलों को, कदम दर कदम
और सरे राह उसूलों की बात करते हैं,

दिए थे गम गए बरस,न जाने कितने
इस बरस उम्मीदों की आरज़ू रखते हैं,

ज़माने भर में कर के रुसवा दोस्तों को
साथ चलने की शिकायत बार-बार करते हैं,

दिखा कर,जता कर नाराज़गी का चलन,
वफाओं के आलम की चाहत रखते हैं.



रविश 'रवि'
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Thursday, 5 December 2013

उजालों की गिरह

दिन कट गया
उजालों की गिरह
खोलने में,
आज की रात
अंधेरों की जुल्फों को
संवारने का
इरादा है.




रविश 'रवि'
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Tuesday, 26 November 2013

दिल की बात !

बात जो दिल से निकली तो
दूर तलक जायेगी....
फिर ये खास नहीं
आम हो जायेगी,
झूठ कह नहीं पाउँगा और
सुच तुझ से
सुना नहीं जायेगा....मेरे मौला !


रविश 'रवि'
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Monday, 11 November 2013

आँखों के बंद होने से पहले

तन्हाई भरी रातों मे
अक्सर....
आँखों के बंद होने से पहले
कुछ धुंधले से साए
जाग जाते हैं,

कुछ आँखों मे नज़र आते हैं
कुछ आँखों से नज़र आते हैं

फिर .....
कुछ टूटे हुए लम्हे
कुछ छूटे हुए लम्हे
चुभो देते हैं नस्तर
दिल तक.....
तो कभी रूह तक...

आँखों की नमी भी सुख जाती है
उस दर्द की तपिश मे
जो महसूस होती है
यादों के टूटे हुए शीशों के टुकड़ों से

चुपके से धंस जाते हैं शरीर मे
और..
निकल पड़ती हैं लहू की बूंदें
दर्द के रूप मे.....

और हम करवटें दर करवटें  
बदलते रहते हैं
तन्हाई भरी रातों मे
अक्सर.....

आँखों के बंद होने से पहले |




रविश 'रवि'
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Wednesday, 6 November 2013

बिखरना

किस तरह
संभालूं खुद को,
कुछ न कुछ
छूट जाता है,
ऐ ज़िंदगी...
तुझे जीने में,
कभी रात
तो
कभी दिन
बीत जाता है.


रविश 'रवि'
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