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Tuesday, 15 November 2016

चाँद से गुफ्तगू !!!

बहुत हो चुकी तेरी चांदनी से बातें,
आज तुझ से गुफ्तगू का इरादा है
रात है आई हिज्र का संदेशा लेकर,
तेरी कश्ती में सफर का इरादा है.


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Tuesday, 8 September 2015

उजालों की गिरह

दिन कट गया 

उजालों की गिरह 
खोलने में,
आज की रात
अंधेरों की जुल्फों को
संवारने का 
इरादा है.


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Tuesday, 24 March 2015

दोस्ती

कभी-कभी गैरों से भी मिला करो,
कहते हैं अपने क्या, सुना करो,
होंगे यूँ तो बहुत अज़ीज़ तुम्हारे
दुश्मनों से भी दोस्ती रखा करो.


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Tuesday, 28 October 2014

कहीं तो होगा

कर रहा हूँ  इकट्ठा  
आज फिर
नज्मों के कुछ टुकड़े,
कच्ची धुप की मुस्कराहटें,
सिली-सिली हवा की नमी,
सूरज की अंगड़ाईयाँ,
और 
ढलती शाम की रुसवाईयाँ,
कहीं तो 
मिल जाये 
तेरे होने 
का 
पता 
और
तेरा अक्स !     


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Monday, 6 October 2014

तेरे साये

तेरी जुल्फों के साये में दिन छोड़ आया हूँ,
तेरे काँधें के तिल पर रातें भूल  आया हूँ.
चाँद निकलता है तेरी खुश्बू को ओढ़ कर,  
तेरे लबों पर साँसों के साये छोड़ आया हूँ.


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Monday, 1 September 2014

पैमाना

नर्गिसी आँखों का पैमाना नहीं मिलता
उसके नाम का ठिकाना नहीं मिलता

भूल भी जाता न जाने मै कब का  
उसे भूलने का बहाना नहीं मिलता,

जल जाती हैं तड़प कर रात भर  
शमाओं को परवाना नहीं मिलता,

उन आँखों का सुरूर जो उतार दे  
शहर में वो मयखाना नहीं मिलता|



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Tuesday, 26 August 2014

कहीं काबा...कहीं बुतखाना

कहीं काबा,कहीं बुतखाना,कहीं गिरजा बना डाला,
मेरे मौला....तेरी रहमत का बाज़ार बना डाला,
बनते थे जो कल तलक रहनुमा तेरी खुदाई का,
सरे-राह.... आज तेरी रूह का सौदा कर डाला,
दिखाता था वो जो अंधेरों में भी रोशनाई मुझे ,
बना के राम और साईं,टुकड़ों में उसे बाँट डाला.


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Wednesday, 13 August 2014

अँधेरे !!!

सूरज से कहो
रात में भी
निकला करे....
काले अंधेरों से
डर लगता है !


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Tuesday, 29 July 2014

चारागार

दिन चढ़े से दिन ढल भी गया
फ़िज़ूल ही तेरी महफ़िल में आया
ख़ामोश साँसें भी बोल पड़ती थीं
जिसे देख कर,वो चारागार न आया.


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Thursday, 5 June 2014

उफ्फ़...ये गर्मी !

उफ्फ़...ये गर्मी !
न जाने कितनो को
तड़पा कर जायेगी
न जाने कितनो की जां
ले कर जायेगी,

लगता है इस बार
गर्मी के दिल ने
गहरी चोट खायी है,
इस साल की गर्मी
बहुत दिलजली है !



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Sunday, 27 April 2014

रिश्तों की सीलन

दीवारों में दरारें
क्या आयीं,
कुछ रिश्तों में
सीलन पड़ गयी है.

वो धूप जो चमकाती थी
हमारे घर के आँगन को,
उस धूप में
गांठें आ गयी हैं.

कहते हैं कि
गर सीलन देर तक रहे तो,
फिर कभी उसकी
‘बू’ नहीं जाती है!



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Thursday, 17 April 2014

धूप के निशाँ

अक्सर घर की मुंडेर पर
धूप आकर बैठ जाती है
और
देर तलक बैठी ही रहती है

शायद...किसी का इंतज़ार करती है
कभी बिलकुल ख़ामोश रहती है
और कभी खुद से ही बातें करती है

ज्यों-ज्यों दिन चदता जाता है
त्यों-त्यों उसकी शिथिलता बढती जाती है
मगर आँखों में इंतज़ार की चमक
बरक़रार रहती है

और फिर...
शाम के जवान होते-होते
समेट लेती है खुद को
और चल पड़ती है वापस
उसी ख़ामोशी से
जिस ख़ामोशी से
बैठी थी मुंडेर पर आकर

और छोड़ जाती है
कुछ अनबुझे से,
कुछ अनसुलझे से
निशाँ,
घर की मुंडेर पर !




© रविश 'रवि'


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Monday, 24 March 2014

दौरे - सियासत

ये कैसा दौरे - आलम है सियासत का ग़ालिब
पैमाना-ए-वफ़ा के पैमाने छूटे और टूटे जाते हैं
सुबह तलक सुनाते हैं जो किस्सा -ए- रफ़ीक   
शाम ढले रकीबों की कतार में नज़र आते हैं.


 रफ़ीक – दोस्त ,   रकीब – विरोधी

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Tuesday, 11 March 2014

खामोश लब

बहुत कोशिश की आज मुस्कराने की,
न जाने क्यों लब खामोश रह गए ....

दो बूंद अश्क जो रुके थे आँखों में,
वो आँखों ही आँखों में बह गए....

बीत गया एक चक्र और ज़िन्दगी का,
मेरे हाथ आज भी ख़ाली रह गए.....

यूँ तो गुजरे थे मेरी रह-गुज़र से,
पर आज भी वो खामोश रह गए |


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Thursday, 20 February 2014

ये साल

एक नजूमी* ने कहा था, ये साल अच्छा गुजरेगा,
कुछ और दोस्तों की नज़र में, मै बेवफा हो गया.


* ज्योतिषी
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Monday, 17 February 2014

तपिश और चांदनी

कुछ तपिश चाँद की चुरा लेता हूँ
कुछ चांदनी सूरज की चुरा लेता हूँ,
कभी इसके साथ सहर बसर कर लेता हूँ
कभी उसके साथ शाम गुजर कर लेता हूँ
|




रविश 'रवि'
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Monday, 3 February 2014

सर्दियों की सुबह

कोहरे की चादर में
लिपटी सड़कें
अलसाता हुआ आलम  
रजाई के गर्माइश में
लिपटा जिस्म
सर्दियों में
सुबह अक्सर
ऐसे ही होती है.



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Tuesday, 28 January 2014

तेरे मेरे दरमियां !!!

तेरे मेरे दरमियां
न जाने
ये कैसा खिचाव है ?

तलाशता रहता हूँ
खुद को
तेरे पहलु में, 

न जाने
कहाँ खो हो गया 
मेरा अक्स ! 
इन घुमावदार..टेढ़े-मेढे
रास्तों पर.  

तेरे मेरे दरमियां
न जाने
ये कैसा खिचाव है...
ए ज़िंदगी !!!



रविश 'रवि'
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Monday, 20 January 2014

रात

मै दरकता रहा
रात सरकती रही,
चाँद चढ़ता रहा
रात कटती रही,
वक्त चलता रहा
रात होती रही,
तेरे ख्वाबों के शानों पर
मेरी रात बीतती रही.



रविश 'रवि'
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Wednesday, 15 January 2014

नज़्म

जो नज़्म तेरी अंजुमन में पढ़ी थी...मेरे मौला,
उसे आज किसी और के हाथों में पाया.

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