Monday, 20 January 2014

रात

मै दरकता रहा
रात सरकती रही,
चाँद चढ़ता रहा
रात कटती रही,
वक्त चलता रहा
रात होती रही,
तेरे ख्वाबों के शानों पर
मेरी रात बीतती रही.



रविश 'रवि'
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Wednesday, 15 January 2014

नज़्म

जो नज़्म तेरी अंजुमन में पढ़ी थी...मेरे मौला,
उसे आज किसी और के हाथों में पाया.

रविश 'रवि'
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Tuesday, 7 January 2014

तेरा इंतज़ार

तमाम राह तेरा इंतज़ार किया
हर रोज़ खुद को जलाता रहा,
तेरे खत के आने की आरजू में
उम्र उधार मांग कर जीता रहा.


रविश 'रवि'
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Wednesday, 1 January 2014

ख्वाहिश

तेरे सिवा किसी और की ख्वाहिश करी
ये मेरी खता थी मेरे मौला,
मुझे किसी और की ख्वाहिश अता करी

ये तेरी खता थी मेरे मौला.



रविश 'रवि'
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Monday, 23 December 2013

हया

कुछ इस तरह आ मेरे आगोश में
कि मेरे वजूद को तेरी खबर न हो,
आँखों से पढ़ लूँ तेरी हया को मै
कि तेरे हिजाब को भी खबर न हो.



रविश 'रवि'
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Monday, 16 December 2013

फितरतें

हम इंसान भी फितरतें अजीब रखते हैं
देकर ज़ख्म,अपने दर्दों का हिसाब रखते हैं,

कहाँ ? कब ? क्यों? और क्या किया?
ये भूल कर, दूसरों की किताब रखते हैं,

दिखा कर आईना अपनी हसरतों का
न जाने गुनाह कितनी बार करते हैं,

तोड़ते हैं उसूलों को, कदम दर कदम
और सरे राह उसूलों की बात करते हैं,

दिए थे गम गए बरस,न जाने कितने
इस बरस उम्मीदों की आरज़ू रखते हैं,

ज़माने भर में कर के रुसवा दोस्तों को
साथ चलने की शिकायत बार-बार करते हैं,

दिखा कर,जता कर नाराज़गी का चलन,
वफाओं के आलम की चाहत रखते हैं.



रविश 'रवि'
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Thursday, 5 December 2013

उजालों की गिरह

दिन कट गया
उजालों की गिरह
खोलने में,
आज की रात
अंधेरों की जुल्फों को
संवारने का
इरादा है.




रविश 'रवि'
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