Monday, 24 March 2014

दौरे - सियासत

ये कैसा दौरे - आलम है सियासत का ग़ालिब
पैमाना-ए-वफ़ा के पैमाने छूटे और टूटे जाते हैं
सुबह तलक सुनाते हैं जो किस्सा -ए- रफ़ीक   
शाम ढले रकीबों की कतार में नज़र आते हैं.


 रफ़ीक – दोस्त ,   रकीब – विरोधी

© रविश 'रवि'
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Tuesday, 18 March 2014

हया का रंग

होली में
जब तुम्हारे गालों पर
गुलाल लगाया था...

न जाने

गुलाल से
गालों पर 
हया का रंग
उभर आया था

या फिर

तुम्हारे गालों से
कुछ रंग चुरा कर
गुलाल
और लाल हो गया था ?


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Tuesday, 11 March 2014

खामोश लब

बहुत कोशिश की आज मुस्कराने की,
न जाने क्यों लब खामोश रह गए ....

दो बूंद अश्क जो रुके थे आँखों में,
वो आँखों ही आँखों में बह गए....

बीत गया एक चक्र और ज़िन्दगी का,
मेरे हाथ आज भी ख़ाली रह गए.....

यूँ तो गुजरे थे मेरी रह-गुज़र से,
पर आज भी वो खामोश रह गए |


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Monday, 3 March 2014

सर्द सुबह!

सर्द मौसम की
सर्द सुबह!
और
तुम्हारा
स्टेशन  पर
मिलने आना....
आज भी
रखी है
वो सर्द सुबह यूँ ही...
मेरी गुल्लक में.



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