raviish 'ravi'
Sunday, 9 February 2014
मुफलिसी
ये कैसी हवा चली है ए ग़ालिब
मुफलिसी भी नीलम हुयी जाती है
उडाकर मजाक गरीबों की भूख का
सियासत की रोटी सेकी जाती है.
रविश
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रवि
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Monday, 3 February 2014
सर्दियों की सुबह
कोहरे की चादर में
लिपटी सड़कें
अलसाता हुआ आलम
रजाई के गर्माइश में
लिपटा जिस्म
सर्दियों में
सुबह अक्सर
ऐसे ही होती है.
रविश
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रवि
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Tuesday, 28 January 2014
तेरे मेरे दरमियां !!!
तेरे मेरे दरमियां
न जाने
ये कैसा खिचाव है ?
तलाशता रहता हूँ
खुद को
तेरे पहलु में,
न जाने
कहाँ खो हो गया
मेरा अक्स !
इन घुमावदार..टेढ़े-मेढे
रास्तों पर.
तेरे मेरे दरमियां
न जाने
ये कैसा खिचाव है...
ए ज़िंदगी !!!
रविश 'रवि'
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Monday, 20 January 2014
रात
मै दरकता रहा
रात सरकती रही,
चाँद चढ़ता रहा
रात कटती रही,
वक्त चलता रहा
रात होती रही,
तेरे ख्वाबों के शानों पर
मेरी रात बीतती रही.
रविश
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रवि
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Wednesday, 15 January 2014
नज़्म
जो नज़्म तेरी अंजुमन में पढ़ी थी...मेरे मौला,
उसे आज किसी और के हाथों में पाया.
रविश
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Tuesday, 7 January 2014
तेरा इंतज़ार
तमाम राह तेरा इंतज़ार किया
हर रोज़ खुद को जलाता रहा
,
तेरे खत के आने की आरजू में
उम्र उधार मांग कर जीता रहा.
रविश
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रवि
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Wednesday, 1 January 2014
ख्वाहिश
तेरे सिवा किसी और की ख्वाहिश करी
ये मेरी खता थी मेरे मौला,
मुझे किसी और की ख्वाहिश अता करी
ये तेरी खता थी मेरे मौला.
रविश
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