Tuesday, 27 May 2014

चाँद की बेचैनी !!!!

चाँद में है बेचैनी
और
तारों में भी है कुछ
सुगबुगाहट सी....
बस
कुछ और पल
और जायेगा
सूरज
उनकी रोशनी का
सौदा करने !!!!

© रविश 'रवि'
raviishravi.blogspot.com

www.facebook.com/raviish.ravi

Monday, 12 May 2014

कुछ ख्वाब पलते

दूर उफ़क पर कुछ ख्वाब पलते हैं
दूर उफ़क पर कुछ ख्वाब ढलते हैं

जब भी लम्हा टूट कर गिरा है आसमां से
मेरे होठों पर तेरी सांसों के चराग जलते हैं

ये शाम ठहर जाती है तेरी सुरमई आँखों में
मेरे जिस्म पर तेरी यादों के नक्श खींचतें हैं

रात ठहर जाती है तेरे कांधे के तिल के तले
मेरी रूह में तेरी रूह के गुलाब मिलते हैं.  



© रविश 'रवि'
raviishravi.blogspot.com

www.facebook.com/raviish.ravi

Sunday, 27 April 2014

रिश्तों की सीलन

दीवारों में दरारें
क्या आयीं,
कुछ रिश्तों में
सीलन पड़ गयी है.

वो धूप जो चमकाती थी
हमारे घर के आँगन को,
उस धूप में
गांठें आ गयी हैं.

कहते हैं कि
गर सीलन देर तक रहे तो,
फिर कभी उसकी
‘बू’ नहीं जाती है!



© रविश 'रवि'
raviishravi.blogspot.com

www.facebook.com/raviish.ravi

Wednesday, 23 April 2014

वतन-बेवतन

सियासतदानों का हुनर तो देख..ग़ालिब
हवाओं को भी तकसीम कर दिया
उड़ते थे जो परिंदे आज़ाद आसमां में,
उन्हें भी आशियानो में कैद कर दिया.

कल तलक जिसे समझते थे खूँ अपना
उसे अपने जिस्म से अलग कर दिया
मेरा गाँव....मेरा शहर....मेरी गलियां,
अपने ही वतन में ‘बेदखल’ कर दिया.



© रविश 'रवि'
raviishravi.blogspot.com
www.facebook.com/raviish.ravi


Thursday, 17 April 2014

धूप के निशाँ

अक्सर घर की मुंडेर पर
धूप आकर बैठ जाती है
और
देर तलक बैठी ही रहती है

शायद...किसी का इंतज़ार करती है
कभी बिलकुल ख़ामोश रहती है
और कभी खुद से ही बातें करती है

ज्यों-ज्यों दिन चदता जाता है
त्यों-त्यों उसकी शिथिलता बढती जाती है
मगर आँखों में इंतज़ार की चमक
बरक़रार रहती है

और फिर...
शाम के जवान होते-होते
समेट लेती है खुद को
और चल पड़ती है वापस
उसी ख़ामोशी से
जिस ख़ामोशी से
बैठी थी मुंडेर पर आकर

और छोड़ जाती है
कुछ अनबुझे से,
कुछ अनसुलझे से
निशाँ,
घर की मुंडेर पर !




© रविश 'रवि'


raviishravi.blogspot.com

www.facebook.com/raviish.ravi

Monday, 24 March 2014

दौरे - सियासत

ये कैसा दौरे - आलम है सियासत का ग़ालिब
पैमाना-ए-वफ़ा के पैमाने छूटे और टूटे जाते हैं
सुबह तलक सुनाते हैं जो किस्सा -ए- रफ़ीक   
शाम ढले रकीबों की कतार में नज़र आते हैं.


 रफ़ीक – दोस्त ,   रकीब – विरोधी

© रविश 'रवि'
raviishravi.blogspot.com

www.facebook.com/raviish.ravi

Tuesday, 18 March 2014

हया का रंग

होली में
जब तुम्हारे गालों पर
गुलाल लगाया था...

न जाने

गुलाल से
गालों पर 
हया का रंग
उभर आया था

या फिर

तुम्हारे गालों से
कुछ रंग चुरा कर
गुलाल
और लाल हो गया था ?


© रविश 'रवि'
raviishravi.blogspot.com

www.facebook.com/raviish.ravi